अरावली पर केंद्र का बड़ा फैसला: नई खनन लीज पर पूर्ण प्रतिबंध, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम
रिपोर्टर- सत्यनारायण सेन गुरला

SvasJsNews | विशेष रिपोर्ट
अरावली पर केंद्र का बड़ा फैसला: नई खनन लीज पर पूर्ण प्रतिबंध, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने दिल्ली से गुजरात तक फैली संपूर्ण अरावली श्रृंखला में नई खनन लीज जारी करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के निर्देश राज्यों को जारी कर दिए हैं। इस फैसले के तहत पूरे अरावली परिदृश्य में किसी भी प्रकार की नई खनन गतिविधि के लिए अनुमति नहीं दी जाएगी, जिससे वर्षों से जारी अवैध और अनियंत्रित खनन पर प्रभावी रोक लग सके।
मंत्रालय ने अपने निर्देशों में स्पष्ट किया है कि यह प्रतिबंध आंशिक नहीं बल्कि पूरे अरावली क्षेत्र पर समान रूप से लागू होगा। इसका उद्देश्य केवल खनन रोकना ही नहीं, बल्कि पर्वतमाला के प्राकृतिक स्वरूप, जैव विविधता, जल स्रोतों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पर्वतमाला उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और इसके क्षरण से वायु प्रदूषण, भूजल स्तर में गिरावट और मरुस्थलीकरण जैसी गंभीर समस्याएं बढ़ी हैं।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब अरावली को बचाने के लिए आमजन, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों द्वारा लंबे समय से संघर्ष किया जा रहा था। जनहित याचिकाओं, जन आंदोलन और वैज्ञानिक रिपोर्टों के माध्यम से लगातार यह मांग उठाई जा रही थी कि अरावली में हो रहे अवैध खनन को रोका जाए। केंद्र सरकार का यह कदम उसी जनसंघर्ष की जीत के रूप में देखा जा रहा है, जिसने नीति स्तर पर निर्णायक हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त किया।
राज्यों को जारी निर्देशों के बाद अब निगरानी और अनुपालन की जिम्मेदारी भी सख्त होगी। माना जा रहा है कि इससे हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर सहित उन क्षेत्रों में पर्यावरणीय सुधार देखने को मिल सकता है, जहां खनन के कारण हरियाली और जल स्रोतों को भारी नुकसान पहुंचा था।
पर्यावरणविदों का कहना है कि यह फैसला केवल प्रतिबंध तक सीमित न रहे, बल्कि पुनर्वनीकरण, जल संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ अरावली के पुनर्जीवन की ठोस योजना भी बनाई जाए। कुल मिलाकर, केंद्र का यह निर्णय अरावली के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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