ओवैसी और चंद्रशेखर से परहेज क्यों?

ओवैसी और चंद्रशेखर से परहेज क्यों?
कांग्रेस-सपा के बीच सीटों की रस्साकशी के बीच विपक्षी खेमे में बढ़ी बेचैनी, छोटे दलों को साथ लेने पर भी उठ रहे सवाल
ब्यूरो रिपोर्ट -मो कलीम अंसारी
सहारनपुर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच सपा-कांग्रेस गठबंधन की तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है। सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान के साथ अब यह सवाल भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है कि कांग्रेस और सपा, AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद को विपक्षी रणनीति में जगह देने से क्यों परहेज कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक सपा जहां 328 सीटों पर अपना दावा मजबूत रखना चाहती है, वहीं कांग्रेस की ओर से करीब 200 सीटों की मांग की बात सामने आ रही है। यदि दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर सहमति नहीं बनती है तो इसका असर पूरे विपक्षी समीकरण पर पड़ सकता है।
‘बड़े दल’ बनाम ‘जमीनी प्रभाव’ का सवाल
AIMIM और आजाद समाज पार्टी का पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत कुछ क्षेत्रों में अपना प्रभाव माना जाता है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों के बीच सवाल उठ रहा है कि यदि विपक्ष का लक्ष्य भाजपा के खिलाफ अधिकतम वोटों को एकजुट करना है तो फिर इन दलों के साथ संभावित तालमेल पर बातचीत क्यों नहीं हो रही।
वहीं, सपा और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर बढ़ती दावेदारी यह संकेत दे रही है कि दोनों दल फिलहाल घमंड के चलते अपने-अपने राजनीतिक आधार और प्रभाव वाले क्षेत्रों को लेकर अधिक सतर्क हैं। गठबंधन में शामिल होकर चुनाव लड़ने के बावजूद दोनों पार्टियां अपनी राजनीतिक जमीन कमजोर नहीं करना चाहतीं। जो कि बिना चंद्रशेखर आजाद और ए आई एम आई एम के बिना कमजोर ही है क्योंकि अब समय बदल रहा है जहां दलित वोट आसपा से काफी हद तक जुड़ रहा है वहीं ओवैसी की दीवानगी भी मुस्लिम युवाओं पर सर चढ़कर बोल रही है जो हम बिहार चुनाव में देख चुके है
अपने परिवारिक विवाद के चलते कांग्रेस सांसद क्या गठबंधन की नुकसान पहुंचा रहे है?
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का यह बयान कि “हम खुद को बर्बाद करके दूसरों की सरकार नहीं बनवाएंगे”, सीट बंटवारे की बहस को और धार देता है। इस बयान को कांग्रेस की ओर से अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी और पहचान को लेकर स्पष्ट संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सपा कांग्रेस को कितनी सीटें देगी या कांग्रेस कितनी सीटों पर समझौता करेगी। बड़ा सवाल यह भी है कि क्या सपा-कांग्रेस अपने राजनीतिक समीकरण के बाहर खड़े ओवैसी और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं से दूरी बनाकर ही 2027 की लड़ाई लड़ेंगी?
आखिर सपा-कांग्रेस अपने घमंड में इतना चूर है कि छोटे लेकिन प्रभावशाली दलों से परहेज कर रही है और क्या मुस्लिम दलित समीकरण सपा का PDA मिशन सिर्फ ढकोसला भर है? जिस सपा को यादव वोट भी नहीं मिल रहे वो मुस्लिम वोटरों को अपनी बपौती समझ रही है ? जो बिहार में इंडिया गठबंधन का हाल हुआ क्या यूपी में भी वही दोहराना चाहती है कांग्रेस सपा, कही यह दूरी विपक्षी वोटों के बिखराव का कारण बन जाए ? 2027 से पहले यह सवाल यूपी की सियासत में लगातार बड़ा होता जा रहा है।



