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पुलिस और वन विभाग में तैनाती नियमों का दोहरा मापदंड: गृह जिले का मुद्दा।

मोहम्मद अरशद तहसील प्रभारी चांदपुर।उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में पुलिस और वन विभाग के कर्मचारियों की तैनाती को लेकर दोहरे मापदंड पर सवाल उठ रहे हैं। एक तरफ पुलिस के सिपाही और दरोगा को गृह जिले में तैनाती नहीं मिलती, वहीं वन विभाग के सिपाही और उप निरीक्षक अपने ही कस्बे-क्षेत्र में नौकरी का आनंद ले रहे हैं।पुलिस विभाग का नियम पुलिस रेगुलेशन के तहत सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक को गृह जिले में तैनाती नहीं दी जाती। इसके पीछे तर्क है कि स्थानीय रिश्तेदारी और दबाव से कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है। निष्पक्ष कार्रवाई के लिए दरोगा-सिपाही को गृह जिले से दूर रखा जाता है।
वन विभाग की स्थिति इसके उलट वन विभाग में बीट गार्ड, वन दरोगा और रेंजर स्तर के कर्मचारियों की बड़ी संख्या में तैनाती उनके गृह जिले, बल्कि कई बार उनके ही कस्बे या रेंज में हो जाती है ऐसा ही वर्तमान में चांदपुर रेंज में हो रहा है।
गृह क्षेत्र में तैनाती के कारण कुछ वनकर्मी अपने पद का रोब दिखाते हैं। अवैध कटान, अतिक्रमण या लकड़ी-परमिट के मामलों में करीबी रिश्तेदारों को फायदा पहुंचा रहे हैं और दूसरों पर दबाव बनाते हैं हॉल ही मे इस तरहॉं की शिकायतें सामने आई हैं। स्थानीय राजनीति और गुटबाजी में भी दखल की बात सामने आती रेहती है।
सेवानिवृत्त IPS अधिकारी कहते हैं कि पुलिस की तरह वन विभाग में भी निष्पक्षता जरूरी है। वनकर्मी के पास भी चालान, गिरफ्तारी और जुर्माने के अधिकार होते हैं। गृह क्षेत्र में पोस्टिंग से “हितों के टकराव” की स्थिति बनती है।
पुलिस की तर्ज पर वन विभाग के सिपाही और उप निरीक्षकों की तैनाती भी गृह जिले से बाहर होनी चाहिये
रुटीन ट्रांसफर सिस्टम  वही होना चाहिए 3-5 साल में अनिवार्य तबादला नीति सख्ती से लागू हो।
गृह क्षेत्र में तैनात वनकर्मियों की संपत्ति और कामकाज की नियमित जांच हो।
जब दोनों विभाग वर्दीधारी हैं और कानून लागू करने का काम करते हैं, तो तैनाती के नियम भी एक जैसे ही होने चाहिए। दोहरे मापदंड से न सिर्फ विभाग की छवि खराब हो रही है, बल्कि आम जनता का भरोसा भी टूटता नज़र आरहा है वर्तमान सरकार को इस पर विचार कर जल्द कार्यवाही को अंजाम देना चाहिए।

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