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अभिभावकों का दोहन करने में लगे है अधिकांश स्कूल संचालक

अभिभावकों का दोहन करने में लगे है अधिकांश स्कूल संचालक

विशेष रिपोर्ट -मो कलीम अंसारी

सहारनपुर सरस्वती विहार में जो बुक्स पिछले वर्ष 40%  छूट पर मिली थी, वहीं बुक्स इस वर्ष दुकान बदलने से 10% छूट पर मिल रही है किसकी जेब में जा रहा है 30% मुनाफा????

*नेपाल*— प्रधानमंत्री बालेन शाह के आदेश के बाद नेपाल में प्राइवेट स्कूल बंद कर दिए गए है, नेपाल में प्रधानमंत्री से लेकर ऑफिसर, चपरासी तक के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ेंगे। यह फैसला वास्तव में सराहनीय है। लेकिन हमारे यहां सरकार और अफसरों के दांत दिखाने के और होते हैं और खाने के और। मीडिया के माध्यम से केवल कागजी घोड़े दौड़ाए जाते है।  अभिभावकों का जमकर दोहन किया जा रहा है, कक्षा आठ तक किसी भी स्कूल संचालक द्वारा एनसीईआरटी की पुस्तकें नहीं लगाई गई है, एनसीईआरटी की पुस्तकों के कवर चेंज कर उनकी पांच से दस गुणा एमआरपी वाली पुस्तकों को ही स्कूल में लगाया जा रहा है।

प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से आदेश किए गए कि किसी को भी किसी एक दुकान से पुस्तक खरीदने को मजबूर नहीं किया जाएगा, लेकिन अभिभावकों को पुस्तकों की लिस्ट उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। मजबूरन डॉक्टरों के पर्चे की तरह अभिभावकों को भी एक खास “मेडिकल स्टोर” यानी स्कूल द्वारा अनुमोदित दुकान पर ही जाना पड़ता है। विशेष बात यह है कि यह पुस्तकें 70 से 80 प्रतिशत तक कमीशन वाली होती है।
पिछले वर्ष सहारनपुर के सरस्वती विहार स्कूल की ओर से प्रकाशक को सीधे स्कूल में बुलवाकर 40 प्रतिशत छूट पर पुस्तकें उपलब्ध कराई थी, इस बार प्रशासन की सख्ती के चलते प्रकाशक को बुलवाया नहीं जा सका,
वहीं पुस्तकें अभिभावकों को मिशन कंपाउंड में एक विशेष दुकान से मात्र दस प्रतिशत छूट पर खरीदनी पड़ रही है, अब यह तीस प्रतिशत किसकी जेब में जा रहा है, यह यक्ष प्रश्न ही है।

दिल्ली रोड पर ही एक बड़े स्कूल की ब्रांच की पुस्तकें उनके हेड क्वार्टर से ही आ रही है। कई स्कूलों के हाल तो और खराब है।

अभिभावकों की मजबूरी है कि जो बुक्स स्कूल में लगी है, वह कहीं और मिलती ही नहीं है। इसका लाइलाज बीमारी का समाधान कक्षा एक से एनसीईआरटी की बुक्स को अनिवार्य करके ही किया जा सकता है या फिर नेपाल वाली तर्ज पर।

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