रूक्मणी ने किया भगवान कृष्ण का वरण, हर्षित हुए भक्तगण, गूंजे द्वारिकाधीश के जयकारे

रूक्मणी ने किया भगवान कृष्ण का वरण, हर्षित हुए भक्तगण, गूंजे द्वारिकाधीश के जयकारे
संत दिग्विजयराम महाराज ने किया रूक्मणी मंगल प्रसंग का भावपूर्ण वाचन
अग्रवाल उत्सव भवन में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान सप्ताह का समापन आज
भीलवाड़ा | SvasJsNews
भीलवाड़ा शहर शनिवार को भक्ति, उल्लास और दिव्य आनंद के अद्भुत संगम का साक्षी बना, जब रोडवेज बस स्टैंड के समीप स्थित अग्रवाल उत्सव भवन में स्व. श्रीमती गीतादेवी तोषनीवाल चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान सप्ताह के छठे दिन रूक्मणी विवाह प्रसंग का भव्य और भावनात्मक मंचन हुआ। रामस्नेही संत एवं प्रखर वक्ता संत दिग्विजयरामजी महाराज के मुखारबिंद से जैसे ही रूक्मणी मंगल प्रसंग का वाचन आरंभ हुआ, पूरा कथा पांडाल भक्तिरस से सराबोर हो गया।

कथा स्थल पर दृश्य किसी साधारण आयोजन का नहीं बल्कि मानो द्वारिका नगरी के सजीव अवतरण का प्रतीत हो रहा था। विवाह का मंच सजा था, बारात में ब्रह्मा, महादेव शंकर सहित देवी-देवताओं की प्रतीकात्मक उपस्थिति दर्शाई गई और स्वयं द्वारिकाधीश भगवान श्रीकृष्ण की बारात निकली। “आज मेरे श्याम की शादी है”, “आज मेरे भगवान की शादी है” जैसे मंगल गीतों की गूंज के बीच श्रद्धालु भाव-विभोर होकर नृत्य और जयकारों में डूब गए।

छठे दिन की कथा में संत दिग्विजयरामजी महाराज ने उद्धव-गोपी संवाद, रूक्मणी विवाह और महारास लीला का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया। जैसे ही मंच पर कृष्ण-रूक्मणी विवाह की सजीव झांकी प्रस्तुत की गई और रूक्मणी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के गले में वरमाला डाली गई, वैसे ही पांडाल में उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालु हर्ष से झूम उठे। “जय द्वारिकाधीश”, “जय श्रीकृष्ण” के जयकारों से वातावरण गूंज उठा और हर चेहरा आनंद व भक्ति से दमक उठा।

संत दिग्विजयरामजी महाराज ने कथा के दौरान रूक्मणी विवाह का आध्यात्मिक संदेश देते हुए कहा कि रूक्मणी ने देवर्षि नारद से भगवान श्रीकृष्ण की महिमा सुनकर उन्हें अपने हृदय में पति रूप में स्वीकार कर लिया था। यह विवाह केवल सांसारिक नहीं बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण रूक्मणी के संदेश पर मां भगवती के मंदिर पहुंचे और सभी बाधाओं को समाप्त कर रूक्मणी को द्वारिका ले गए, जहां संपूर्ण नगरी हर्षोल्लास से भर उठी।

महारास लीला के वर्णन में संतश्री ने कहा कि महारास परमात्मा की प्राप्ति का सर्वोच्च मार्ग है। राधारानी और गोपियों का कृष्ण से प्रेम दैहिक नहीं बल्कि आत्मिक था। राधा योगमाया का स्वरूप हैं, वह केवल प्रेमिका नहीं बल्कि उपासिका हैं। राधा को समझने के लिए दिव्य दृष्टि की आवश्यकता है। गोपी भाव को अपनाने से ही ईश्वर की सच्ची प्राप्ति संभव है। उन्होंने शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में हुए महारास का वर्णन करते हुए बताया कि उस दिव्य लीला में समस्त गोपियां, देवता और स्वयं राधारानी सहभागी बनी थीं।

कथा के दौरान संगीतमय भजनों की अविरल धारा बहती रही। “आओ सखी मुझे मेहंदी लगा दो, मुझे श्याम सुंदर की दुल्हन बना दो”, “बन्नो मारो द्वारिकानाथ, बन्नी तो मारी रूकमण लाड़ली”, “ये तो प्रेम की बात है, बंदगी तेरे बस की नहीं है” जैसे भजनों पर श्रद्धालु अपनी जगह छोड़ नृत्य करने लगे। संत दिग्विजयरामजी द्वारा प्रस्तुत “राधा नाचे, कृष्ण नाचे, नाचे गोपीजन” भजन पर पूरा कथा मंडप मानो महारास मंडप में परिवर्तित हो गया।
कथा के प्रारंभ और समापन अवसर पर आयोजक तोषनीवाल परिवार के सदस्यों तथा श्रद्धालुओं द्वारा व्यासपीठ की भव्य आरती की गई। छठे दिन की कथा के उपरांत झोली फैलाकर कन्यादान स्वरूप सामाजिक सरोकार का अनुपम उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया। रूक्मणी विवाह के बाद एक लाख 71 हजार रुपये की सहयोग राशि एकत्र कर केशव आदर्श घुमक्कड़ बेसहारा परिवार के बच्चों हेतु संचालित आवासीय विद्यालय, भीलवाड़ा को प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त मूक-बधिर विद्यालय सेवा आश्रम, भीलवाड़ा के लिए संत दिग्विजयरामजी महाराज द्वारा 51 हजार रुपये की सहायता राशि भेंट की गई।
इससे पूर्व प्रातःकाल आयोजक तोषनीवाल परिवार द्वारा ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच तुलसीजी का विवाह भगवान चारभुजानाथ के संग विधिवत रूप से सम्पन्न कराया गया। संत दिग्विजयरामजी महाराज ने इसे सुखद संयोग बताते हुए कहा कि एक ही दिन में प्रातः तुलसी विवाह और सायंकाल भगवान श्रीकृष्ण-रूक्मणी विवाह का आयोजन अत्यंत पुण्यदायी है।

श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान सप्ताह का समापन रविवार को होगा। अंतिम दिन दोपहर 2 बजे से सायं 6 बजे तक सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष प्रसंग का वाचन किया जाएगा, जिसके पश्चात महाआरती के साथ कथा का विधिवत विश्राम होगा।
भक्ति, सेवा और सामाजिक चेतना का यह महायज्ञ श्रद्धालुओं के हृदय में दीर्घकाल तक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता रहेगा।






