बॉलीवुड के जाने-माने कलाकार ब्रिजेश करनवाल प्रकरण: पारदर्शिता की आवाज़, व्हिसलब्लोअर का सवाल और न्यायालय की दहलीज़

बॉलीवुड के जाने-माने कलाकार ब्रिजेश करनवाल प्रकरण: पारदर्शिता की आवाज़, व्हिसलब्लोअर का सवाल और न्यायालय की दहलीज़
विशेष रिपोर्ट–मो कलीम अंसारी
सहारनपुर CINTAA (Cine & TV Artistes’ Association) देश की एक प्रतिष्ठित कलाकार संस्था है, जिसकी स्थापना फिल्म एवं टेलीविजन कलाकारों के कल्याण, अधिकारों की रक्षा और पारदर्शी कार्यप्रणाली के उद्देश्य से की गई थी।
इस संस्था से फिल्म और टेलीविजन जगत के कई बड़े और जाने-माने कलाकार वर्षों से जुड़े रहे हैं, जिससे इसका महत्व केवल आंतरिक नहीं बल्कि सार्वजनिक हित से भी जुड़ा हुआ है।
बॉलीवुड के जाने-माने कलाकार सहारनपुर निवासी ब्रिजेश करनवाल ने प्रेस नोट जारी करके उनके साथ हो रही घटना की जानकारी दी उन्होंने अपने साथ हुई कथित घटनाओं को लेकर
कानून के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई है,
जिसके बाद यह मामला अब न्यायालय के समक्ष पहुँच चुका है।
ब्रिजेश करनवाल का कहना है कि
जब-जब उन्होंने CINTAA के भीतर पारदर्शिता, जवाबदेही और कलाकारों के हितों से जुड़े मुद्दों पर आवाज़ उठाई,
तब-तब उनकी यह पहल संस्था से जुड़े कुछ प्रभावशाली पदाधिकारियों को कथित रूप से पसंद नहीं आई।
ब्रिजेश करनवाल का कहना है कि जब-जब उन्होंने कलाकारों के हित में 8 घंटे की कार्य-शिफ्ट, समय पर मेहनताना, कन्वेयंस (यात्रा भत्ता) और संस्था के खातों में पारदर्शिता जैसे बुनियादी मुद्दों पर आवाज़ उठाई, तब-तब उन्हें कथित रूप से निशाना बनाया गया।
उनके अनुसार, उन पर झूठे आरोप लगाकर और पद की शक्ति का दुरुपयोग करते हुए उनका CINTAA सदस्यता कार्ड रद्द किया गया।
ब्रिजेश करनवाल का कहना है कि यह कार्रवाई बिना किसी प्रभावी सुनवाई के, तथा सुनवाई की प्रक्रिया के दौरान भी उन्हें डराने-धमकाने और विभिन्न प्रकार के दबाव व प्रलोभन देने की परिस्थितियों के बीच की गई।
ब्रिजेश करनवाल के अनुसार, उनका सदस्यता कार्ड ऐसे समय पर रद्द किया गया जब संस्था से जुड़ा एक पारदर्शिता का मामला पहले से ही Registrar of Trade Unions के समक्ष लंबित था, जिससे उन पर और अधिक दबाव बनाया जा सके और उनकी आवाज़ को कमजोर किया जा सके।
उनका यह भी कहना है कि इन घटनाओं के चलते
उन्हें पेशेवर रूप से अलग-थलग करने की स्थिति बनी,
उनके विरुद्ध भय और दबाव का वातावरण तैयार किया गया,
और कलाकारों के हित में उठने वाली आवाज़ को शांत करने का प्रयास हुआ।
ब्रिजेश करनवाल का कहना है कि कलाकारों के हक़ की बात करना उनके लिए सज़ा बन गया।
उनके अनुसार, उनके साथ जो व्यवहार हुआ, वह प्रथम दृष्टया कानून के दायरे में आने वाला प्रतीत होता है।
इसी कारण, उन्होंने न्याय की उम्मीद में मजिस्ट्रेट न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया है, जहाँ यह मामला वर्तमान में विचाराधीन है।
उनका कहना है कि यह स्थिति
एक ऐसे व्यक्ति की ओर संकेत करती है
जो संस्थागत ढांचे के भीतर
सार्वजनिक हित में सवाल उठाने वाले व्हिसलब्लोअर की भूमिका निभा रहा है,
और जिसकी आवाज़ को दबाने का प्रयास किया गया।
प्रकरण अब एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—
क्या किसी प्रतिष्ठित संस्था के भीतर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करने वाला कलाकार, व्हिसलब्लोअर की भूमिका निभाते हुए, दबाव और प्रताड़ना का शिकार बन सकता है?
कुछ कार्यालयीन पदाधिकारियों के विरुद्ध कथित
ब्रिजेश करनवाल का आरोप है कि उन्हें अलग-अलग तरीकों से लगातार प्रताड़ित किया गया। उनके अनुसार, न केवल उनकी मान-हानि की गई, बल्कि उन्हें भाषा, जातीय क्षेत्र और पैसों से जुड़े मुद्दों को लेकर भी बार-बार मानसिक रूप से परेशान किया गया।
उनका कहना है कि इस तरह के व्यवहार से न सिर्फ उनकी सामाजिक और पेशेवर छवि को ठेस पहुंची, बल्कि उन्हें दबाव में लाकर चुप कराने का भी प्रयास किया गया।धमकी, डराने-धमकाने, दबाव
और मानसिक उत्पीड़न से संबंधित घटनाओं को लेकर
कानूनी प्रक्रिया प्रारंभ की गई है,
जो वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है।
किसी को बदनाम करने का प्रयास नहीं,
बल्कि न्याय, पारदर्शिता और कलाकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए है
संस्था के भीतर निर्णय-प्रक्रिया पर्याप्त संवाद और पारदर्शिता के बिना की जा रही है।
ब्रिजेश करनवाल ने मीडिया और समाज से अपील की है कि
इस विषय को संवैधानिक मूल्यों और निष्पक्षता के साथ देखा जाए इस लड़ाई का उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि न्याय, गरिमा और कलाकारों के हितों की रक्षा है।न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना संवैधानिक अधिकार है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना शर्मा supreme court of India का कहना है कि कानून से ऊपर कोई भी नहीं हो सकता। किसी भी प्रकार के अपराध या कथित आपराधिक आचरण के प्रति शून्य सहनशीलता होनी चाहिए।
भारतीय संवैधानिक मूल्यों की भावना यह है कि अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना नागरिक कर्तव्य है, क्योंकि मौन रहना भी अन्याय को बढ़ावा दे सकता है।
। गीता भी यही सिखाती है कि अन्याय के सामने चुप रहना स्वयं में पाप के समान है। ऐसे मामलों में सत्य, न्याय और संवैधानिक मूल्यों के साथ खड़ा होना ही लोकतंत्र की आत्मा है।



