उत्तर प्रदेश की पारंपरिक नौटंकी और लोक रंगमंच को संरक्षण की जरूरत, कलाकारों ने उठाई सम्मानजनक मंच की मांग
ब्यूरो रिपोर्ट उत्तर प्रदेश

लोककला की आवाज दबे नहीं, कलाकारों का चूल्हा बुझने न पाए
उत्तर प्रदेश की पारंपरिक नौटंकी और लोक रंगमंच को संरक्षण की जरूरत, कलाकारों ने उठाई सम्मानजनक मंच की मांग
लखनऊ। | SvasJsNews
उत्तर प्रदेश की पहचान केवल उसकी ऐतिहासिक इमारतों और धार्मिक स्थलों से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोककला और लोक रंगमंच परंपरा से भी जुड़ी है। नौटंकी, रामलीला, कृष्णलीला, भारत-मिलाप, धनुष-यज्ञ सहित अनेक पारंपरिक मंचीय कार्यक्रम लंबे समय से ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में सांस्कृतिक मनोरंजन के साथ सामाजिक संदेश का माध्यम रहे हैं।
नौटंकी की पारंपरिक प्रस्तुतियों में हारमोनियम, नगाड़ा, ढोलक और गायन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन आयोजनों से केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि वादक, मंचकर्मी, वेशभूषा तैयार करने वाले और अन्य सहयोगी भी अपनी आजीविका जोड़ते हैं। समय के साथ मनोरंजन के साधन बदले हैं और लोक मंचों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हुई हैं। वहीं कुछ प्रस्तुतियों की शैली को लेकर दर्शकों या स्थानीय स्तर पर आपत्तियां भी सामने आ सकती हैं। ऐसे मामलों में संबंधित नियमों और निर्धारित मर्यादाओं का पालन कराया जाना आवश्यक है। लेकिन पूरी लोककला को एक ही नजर से देखना कलाकारों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
जरूरत इस बात की है कि सांस्कृतिक आयोजनों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश हों, ताकि कलाकारों की अभिव्यक्ति, दर्शकों की गरिमा और सार्वजनिक मर्यादा—तीनों का संतुलन बना रहे। कलाकारों और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों की अपेक्षा है कि शासन स्तर पर लोक कलाकारों का पंजीकरण, प्रशिक्षण, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अवसर और आर्थिक सहयोग जैसी व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जाए।
आखिर सवाल सिर्फ एक मंच या एक कार्यक्रम का नहीं है। सवाल उन परिवारों का भी है जिनकी रोजी-रोटी कला, संगीत और मंचीय प्रस्तुतियों से चलती है। लोककला की गरिमा भी बनी रहे और कलाकारों के घर का चूल्हा भी जलता रहे—इसी संतुलित सोच के साथ उत्तर प्रदेश की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
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