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धारा 125 CrPC और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 पर कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जानिए पत्नी के अंतरिम भरण-पोषण को लेकर क्या कहा न्यायालय ने

विधिक चर्चा ना मालिक

धारा 125 CrPC और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 पर कलकत्ता हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जानिए पत्नी के अंतरिम भरण-पोषण को लेकर क्या कहा न्यायालय ने

कोलकाता। वैवाहिक विवादों में अंतरिम भरण-पोषण (Alimony Pendente Lite) को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय का एक महत्वपूर्ण निर्णय आज भी पारिवारिक न्यायालयों में एक अहम मिसाल के रूप में देखा जाता है। 8 जून 2005 को दिए गए देबनारायण हल्दर बनाम अनुश्री हल्दर मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (तत्कालीन CrPC) की धारा 125 और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 का उद्देश्य अलग-अलग है। इसलिए यदि किसी पत्नी को धारा 125 के तहत भरण-पोषण नहीं मिला है, तो केवल इसी आधार पर उसे धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

अदालत के समक्ष आए रिकॉर्ड के अनुसार पति-पत्नी का विवाह 24 फरवरी 1985 को हुआ था और उनके एक पुत्र का जन्म 14 जनवरी 1987 को हुआ। पत्नी का आरोप था कि विवाह के कुछ ही दिनों बाद से उसे दहेज और अन्य कारणों से मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। वर्ष 1997 में वह अपने पुत्र के साथ मायके चली गई और उसके बाद पति-पत्नी के बीच कई कानूनी मुकदमे शुरू हो गए।

पत्नी ने पहले धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग की थी। मजिस्ट्रेट ने केवल पुत्र के लिए ₹1,500 प्रतिमाह भरण-पोषण मंजूर किया और पत्नी को राहत देने से इंकार कर दिया। बाद में उच्च न्यायालय ने पत्नी को भी भरण-पोषण देने का आदेश दिया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उस आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि पत्नी यह साबित नहीं कर सकी कि उसके पास पति से अलग रहने का पर्याप्त कारण था।

इसके बाद क्या हुआ?

इसी बीच पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना का मुकदमा दायर किया। उस मुकदमे में पत्नी ने धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण की मांग की, जिसे निचली अदालत ने स्वीकार करते हुए भुगतान का आदेश दिया। बाद में पति ने वह मुकदमा वापस ले लिया। इसके बाद जब पति द्वारा दायर तलाक की याचिका खारिज हुई और मामला अपील में पहुँचा, तब पत्नी ने पुनः धारा 24 के अंतर्गत अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।

धारा 125 और धारा 24 में क्या अंतर बताया?

कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि धारा 125 CrPC का उद्देश्य ऐसे जीवनसाथी को भरण-पोषण देना है जो स्वयं का पालन-पोषण नहीं कर सकता, लेकिन इस धारा में यह भी देखा जाता है कि पत्नी बिना उचित कारण पति से अलग तो नहीं रह रही है।

इसके विपरीत, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 का उद्देश्य मुकदमे के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर पति या पत्नी को न्यायिक प्रक्रिया चलाने और अपना जीवनयापन करने के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। इस धारा में यह शर्त नहीं है कि पहले यह सिद्ध किया जाए कि अलग रहने का कारण उचित था। यदि आवेदक के पास पर्याप्त स्वतंत्र आय नहीं है और दूसरा पक्ष आय अर्जित करने में सक्षम है, तो न्यायालय अंतरिम भरण-पोषण दे सकता है।

न्यायालय ने क्या फैसला दिया?

सभी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने पत्नी और पुत्र के पक्ष में कुल ₹5,000 प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण मंजूर किया। इसमें ₹3,000 पत्नी तथा ₹2,000 पुत्र के लिए निर्धारित किए गए। इसके अलावा पति को ₹15,000 मुकदमे का खर्च (Litigation Cost) भी अदा करने का निर्देश दिया गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह भुगतान आवेदन की तिथि से प्रभावी होगा।

फैसले का कानूनी महत्व

यह निर्णय पारिवारिक कानून के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC के तहत राहत न मिलने का अर्थ यह नहीं है कि धारा 24 हिंदू विवाह अधिनियम के तहत भी राहत नहीं मिलेगी। दोनों कानूनों का उद्देश्य अलग-अलग है और धारा 24 के अंतर्गत मुख्य प्रश्न यह होता है कि आवेदक के पास अपनी आजीविका एवं मुकदमे का खर्च वहन करने के लिए पर्याप्त स्वतंत्र आय है या नहीं।

यह फैसला आज भी वैवाहिक विवादों में अंतरिम भरण-पोषण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत के रूप में उद्धृत किया जाता है।

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