शून्य विवाह की दूसरी पत्नी को नहीं मिलेगा CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण
विधिक चर्चा ब्यूरो रिपोर्ट

शून्य विवाह की दूसरी पत्नी को नहीं मिलेगा CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण, बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का ऐतिहासिक फैसला
नई दिल्ली/मुंबई। हिंदू विवाह अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के अधिकार को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ (Full Bench) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया, जो आज भी भारतीय पारिवारिक कानून में एक प्रमुख मिसाल माना जाता है। ‘श्रीमती यमुनाबाई अनंतराव आढव बनाम अनंतराव शिवराम आढव एवं अन्य’ मामले में 22 अप्रैल 1982 को दिए गए इस फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि किसी हिंदू महिला का विवाह इसलिए शून्य (Void) है क्योंकि विवाह के समय पुरुष की पहली पत्नी जीवित थी, तो ऐसी महिला को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत “पत्नी” का दर्जा प्राप्त नहीं होगा और वह भरण-पोषण की हकदार नहीं मानी जाएगी।
क्या था पूरा मामला?
मामले में याचिकाकर्ता महिला का विवाह हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ और उसका पंजीकरण भी कराया गया था। बाद में यह तथ्य सामने आया कि विवाह के समय पति की पहली पत्नी जीवित थी और उसका विवाह विधिक रूप से जारी था। महिला ने पति से अलग होने के बाद धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण की मांग की, लेकिन मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायालय और अंततः पूर्ण पीठ ने यह माना कि यह विवाह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के अनुसार प्रारंभ से ही शून्य था। इसलिए याचिकाकर्ता को विधिक पत्नी का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
न्यायालय ने क्या कहा?
पूर्ण पीठ ने अपने फैसले में कहा कि धारा 125 CrPC का उद्देश्य निर्धन एवं परित्यक्त महिलाओं, बच्चों और माता-पिता को त्वरित राहत देना है, लेकिन इस धारा में प्रयुक्त “पत्नी” शब्द का अर्थ केवल विधिक रूप से विवाहित पत्नी (Legally Wedded Wife) है। यदि विवाह कानून की दृष्टि में शून्य है, तो ऐसी महिला धारा 125 के तहत भरण-पोषण की पात्र नहीं होगी। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पति-पत्नी की तरह साथ रहना या समाज द्वारा पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया जाना, किसी शून्य विवाह को वैध नहीं बना सकता।

धारा 25 और धारा 125 में अंतर भी किया स्पष्ट
न्यायालय ने यह भी कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में स्थायी भरण-पोषण का प्रश्न अलग हो सकता है, लेकिन उससे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 की व्याख्या प्रभावित नहीं होगी। धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष (Secular) प्रावधान है, जो सभी धर्मों के नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है। इसलिए व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर “पत्नी” शब्द का विस्तार नहीं किया जा सकता।
अंतिम फैसला
पूर्ण पीठ ने अपने अंतिम निर्णय में पूर्व के बाजीराव बनाम तोलानबाई फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि धारा 125 CrPC के अंतर्गत केवल वैध विवाह से उत्पन्न पत्नी ही भरण-पोषण की अधिकारी होगी। याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालतों के आदेश बरकरार रखे गए, हालांकि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए प्रतिवादी को याचिकाकर्ता के वाद-व्यय के रूप में ₹1,000 अदा करने का निर्देश दिया गया।
कानूनी महत्व
यह निर्णय भारतीय पारिवारिक कानून में एक महत्वपूर्ण नज़ीर माना जाता है। इसने यह सिद्धांत स्थापित किया कि धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त करने के लिए विवाह का विधिक रूप से वैध होना आवश्यक है। साथ ही, इस फैसले ने व्यक्तिगत कानून और धर्मनिरपेक्ष आपराधिक प्रक्रिया कानून के बीच स्पष्ट सीमांकन भी किया।



